सिंघाड़ा -बेजोड़ फल

सिंघाड़ा

यूं तो सिंघाड़ा एक साधारण और सस्ता सा फल जो बहुत कम सेवन किया जाता है। लेकिन गुण लाभ की दृष्टि से यह सस्ता होते हुए बहुत गुणकारी फल है । इस उपेक्षित फल विषय में परिचय प्रस्तुत करके हम आपको एक फल से परिचित करा रहे हैं जो सस्ता होते हुए आपको पौष्टिकता प्रदान करने में सक्षम है ।यह शीतल , स्वादिष्ट , भारी , पोषक व वीर्यवर्द्धक , कसैला , ग्राही , वीर्य वात तथा कफ बढ़ाने वाला तथा पित्त , रक्तविकार और जलन को करने वाला है।

 सिंघाडा रक्तपित्तनाशक , कामोद्दीपक , त्रिदोषनाशक , ताप निवारक , लिंग को दृढ़ करने वाला और रुचिकारक होता है । 
आयुर्वेद के अनुसार सिंघाड़ा अत्यन्त कमोद्दीपक , मलरोधक , वीर्यवर्द्धक , लिंग को कठोर करने वाला , वात और कफ बढ़ाने वाला कसैला , मधुर , शीतल , स्वादिष्ट , तृप्तिदायक पित्त तथा दाहनाशक और त्रिदोष , प्रमेह , रक्तविकार , भ्रमसूजन तथा सन्ताप को नष्ट करने वाला है ।
सिंघाड़ा तालाबों में पैदा होता है और इसके पत्ते पानी की सतह पर तैरते रहते हैं । 
इसका शरीर तिकोने आकार का होता है और कोने कांटेदार होते हैं । कच्ची हालत में हरा और पकने पर काला जाता है । इसको छीलने पर अन्दर से दूधिया सफ़ेद रंग की गिरी निकलती है जो सूखने पर सख्त जाती है बाज़ार में सूखा सिंघाड़ा मिलता है और यही ज्यादातर उपयोग में लिया जाता है । यह सारे देश में खासकर मध्यप्रदेश , उत्तर प्रदेश , बिहार उड़ीसा आदि प्रान्तों में बहुतायत से पैदा होता ।
उपयोग - इसे खाद्य पदार्थ की जगह उपवास रखने वाले फलाहार के रूप में प्रयोग करते हैं को पीस कर नाना प्रकार के व्यंजन बना कर खाते हैं यह स्वाद में मधुर और ठण्डी प्रकृति का होता है औषधि के रूप में भी घरेलू इलाज में इसका उपयोग लाभप्रद होता है । यह बहुत पौष्टिक और बलवीर्यवर्द्धक तत्वों से युक्त फल है जिसमें प्रोटीन वसा , कार्बोहाइड्रेट , खनिज द्रव्य ( जैसे आयोडिन केल्शियम , फास्फोरस , लोह ताम , मेगनीज मेगनेशियम , सोडियम और पोटाशियम आदि ) प्राकृतिक रूप से मौजूद रहते हैं और विटामिन ए . ' बी ' , और ' सी ' भी पाये जाते हैं । इसलिए यह सस्ता होते हुए भी मूल्यवान और महंगे फलों जैसे गुण और लाभ करने वाला फल है इसको सेवन कर लाभ उठाना चाहिए । 
यहां इसके इस्तेमाल के कुछ तरीके आपको बताए जा रहे हैं। 
( 1 ) आहार के रूप में इसका हलवा और रोटी बना कर खाना चाहिए । इसकी रोटी , लप्सी या हलवा के सेवन से एसिडिटी(अम्लपित्त ) और रक्तप्रदर रोग का शमन होता है और अतिसार रोग मिटता है । जिन युवक युवतियों के शरीर दुबले पतले , गाल पिचके हुए और चेहरे मुरझाए हुए हो उन्हें सिंघाड़े का सेवन करना चाहिए । दो तीन माह में ही उनका शरीर सुडौल और चेहरा भरा हुआ हो जाएगा । यदि केवल 8-10 पके हुए सिंघाड़े छील कर प्रतिदिन नाश्ते के रूप में सुबह खाकर ऊपर से दूध पिएं तो भी इसका लाभ लिया जा सकता है ।
( 2 ) जिन स्त्रियों को रक्तप्रदर रोग के कारण मासिक साव के समय अधिक रक्तसाव होता हो उन्हें सिंघाडे के आटे की एक मोटी रोटी बनाकर , उसमें शुद्ध घी लगाकर , खूब चबा चबा कर प्रतिदिन खाना चाहिए । इससे उन्हें लाभ होगा । युवक एवं अधेड़ पुरुष इसकी रोटी या हलवा खाएं या सिंघाड़े का चूर्ण 10 ग्राम मात्रा में दूध के साथ सेवन करें तो बलवीर्य की वृद्धि होगी और शरीर पुष्ट । जिन्हें अतिसार के कारण बार - बार और पतले दस्त होते हों उन्हें भी इसकी रोटी खाना चाहिए ।(3) गर्भवती स्त्रियों के लिए तो यह बहुत ही गुणकारी और पौष्टिक आहार है जो गर्भवती और गर्भस्थ शिशु के लिए समान रूप से लाभप्रद सिद्ध होता है । इसके पोषक तत्व दोनों के शरीर का पोषण करते हैं । यह गर्भ की रक्षा करता है और गर्भपात की सम्भावना को समाप्त करता है । यह मांसाहारी व्यंजनों के तत्वों की पूर्ति करने वाला है और मांसाहार के दोषों से रहित है ।
 ( 4 ) जिन्हें गले के रोग , टांसिल्स या खराश रहने की शिकायत रहती हो उन्हें सिंघाड़े का सेवन करना चाहिए । इसमें मौजूद ' आयोडिन ' इस शिकायत को दूर करता है ।
 (5 ) धातुक्षीणता , यौनशक्ति की कमी तथा शारीरिक कमज़ोरी व दुबलेपन को दूर करने लिए सिंघाड़े का सेवन निरापद रूप से लाभप्रद अतः इस सस्ते , गुणकारी और आसानी से उपलब्ध होने वाले फल का सेवन करना चाहिए ।

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